भूमि विवाद से आत्महत्या तक,आदिवासी परिवार की शिकायत पर विनोद अग्रवाल सहित 6 लोगो की जमानत याचिका ख़ारिज

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PNBCG News संवाददाता पवन बघेल तिल्दा-नेवरा

भूमि विवाद से आत्महत्या तक: आदिवासी परिवार की शिकायत पर विनोद अग्रवाल सहित 6 अभियुक्तों की ज़मानत याचिका ख़ारिज

बिलासपुर । स्थान: राजपुर, बलरामपुर-रामानुजगंज

पहाड़ी कोरवा जनजाति से संबंधित दिवंगत भैराराम की आत्महत्या के मामले में दर्ज अपराध क्रमांक 103/2025 में नामजद 6 आरोपियों की अग्रिम/नियमित जमानत याचिकाएँ छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट, बिलासपुर ने खारिज कर दी हैं। यह आदेश न्यायमूर्ति संजय कुमार जायसवाल की एकल पीठ ने पारित किया।

मामले का पृष्ठभूमि:
अभियोजन के अनुसार, पीड़िता जुबारो बाई की भूमि को षड्यंत्रपूर्वक शिवराम के नाम पर विक्रय कर दिया गया, जिसमें कोई मुआवजा नहीं दिया गया। मृतक भैराराम (जुबारो बाई के पति) को बार-बार धमकाकर और जमीन छोड़ने के लिए दबाव बनाकर मानसिक रूप से प्रताड़ित किया गया, जिससे क्षुब्ध होकर उन्होंने 21-22 अप्रैल 2025 की रात को आत्महत्या कर ली।

दर्ज अपराध:
इस प्रकरण में धारा 108, 3(5) भारतीय न्याय संहिता 2023 एवं अनुसूचित जाति जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम की धारा 3(2)(v) के तहत अपराध दर्ज किया गया है। इससे पूर्व 23 अप्रैल को अपराध क्रमांक 90/2025 भी धोखाधड़ी के तहत दर्ज हुआ था, जिसमें कुछ अन्य आरोपी शामिल थे।

जिनकी ज़मानत याचिकाएँ खारिज हुईं:
विनोद कुमार अग्रवाल
प्रवीण अग्रवाल
दिलीप टिग्गा
चतुरगुण यादव
राजेन्द्र मिंज
धरमपाल कौशिक

अदालत की टिप्पणी:
न्यायालय ने माना कि पुलिस जांच अभी अधूरी है और प्रथम दृष्टया आरोपियों की भूमिका स्पष्ट होने के कारण इस समय अग्रिम या नियमित ज़मानत देना उचित नहीं होगा। विशेषत: विनोद अग्रवाल और प्रवीण अग्रवाल के खिलाफ पूर्व में भी कई आपराधिक मामले दर्ज हैं।
राज्य की दलील:
राज्य की ओर से उपसरकार अधिवक्ता सुनीता मणिकपुरी ने जमानत याचिकाओं का विरोध करते हुए कहा कि जांच अभी जारी है और आरोप गंभीर प्रकृति के हैं। ऐसे में ज़मानत देना जांच को प्रभावित कर सकता है।
निष्कर्ष:
उच्च न्यायालय ने सभी याचिकाएँ अस्वीकार करते हुए ट्रायल कोर्ट को आदेश की प्रति शीघ्र भेजने का निर्देश दिया है। यह समाचार न्यायिक आदेश (CRA No. 1034/2025 & Others) पर आधारित है।

“मग्गू सेठ फाइल्स” “जमीन, जुर्म और जुबानबंदी” — एपिसोड 1

“एक कोरवा की ज़मीन से शुरू हुई थी कहानी, अब आत्महत्या की जांच तक जा पहुँची है।”

छत्तीसगढ़ के सुदूर आदिवासी अंचल बलरामपुर-रामानुजगंज में, एक नाम वर्षों से फुसफुसाहटों में गूंजता रहा है — विनोद अग्रवाल उर्फ “मग्गू सेठ”। जो कभी स्थानीय व्यापारी के रूप में जाना जाता था, अब उस पर आदिवासी जमीन हड़पने, कूटनीति, साजिश और यहां तक कि आत्महत्या के लिए उकसाने जैसे संगीन आरोप हैं।
भाग 1: ज़मीन — एक कोरवा महिला की पुश्तैनी विरासत
कहानी शुरू होती है जुबारो बाई से — एक पहाड़ी कोरवा महिला, जिसकी ज़मीन उसके पति भैराराम के नाम पर संयुक्त खाता दर्ज में थी। आदिवासी महिला को ज़मीन के दावों और दस्तावेजों की जटिलता समझना नहीं आता था। यही कमजोरी मग्गू सेठ जैसे चालाक ज़मींदारों के लिए ताकत बन गई।
18 नवंबर 2024 को, बिना किसी पारिवारिक सहमति या भुगतान के, ज़मीन किसी शिवराम के नाम पंजीकृत करवा दी गई — आरोप है कि ये रजिस्ट्री धोखाधड़ी और छल से करवाई गई थी। पीछे की डोर से कागज़ तैयार हुए, अंगूठे लगे और ज़मीन खिसक गई।
भाग 2: जुर्म — एक बुज़ुर्ग आदिवासी को मानसिक प्रताड़ना
सिर्फ जमीन छीनना ही नहीं, बल्कि भैराराम को रोज़ाना धमकाना, “ये ज़मीन अब हमारी है, भाग जा” कहना, उसका पीछा करना, उसे ताने देना — ये सब आरोपितों का रोज़ का खेल बन गया था।
और अंत में, 21-22 अप्रैल 2025 की रात — भैराराम ने आत्महत्या कर ली।

बेटे संत्राम ने जब शव देखा, तो बस यही कहा:

“बापू का आत्मसम्मान छीन लिया था इन्होंने, अब जीवन भी छीन लिया।”

भाग 3: जुबानबंदी — सत्ता, डर और चुप्पी का ताना-बाना
विनोद अग्रवाल पर पहले से 9 आपराधिक मामले दर्ज हैं। लेकिन कोई कार्रवाई क्यों नहीं?
क्योंकि ‘मग्गू सेठ’ सिर्फ ज़मींदार नहीं, एक “नेटवर्क” है। आरोप हैं कि स्थानीय नेताओं, अधिकारियों और दलालों से उसकी मजबूत साँठगाँठ है। रिपोर्टिंग करने वालों को डराया जाता है, पीड़ितों को चुप कराया जाता है।

जुबानबंदी सिर्फ पीड़ितों की नहीं, पत्रकारों की भी होती है।
एक स्थानीय रिपोर्टर ने नाम न छापने की शर्त पर बताया:

“अगर तुमने मग्गू सेठ का नाम लिया, तो तुम भी ‘केस’ में शामिल कर दिए जाओगे।”

न्याय की पहली दस्तक
1 जुलाई 2025 को, छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने विनोद अग्रवाल सहित छह आरोपियों की ज़मानत याचिकाएँ खारिज कर दीं। जज संजय कुमार जायसवाल की बेंच ने कहा —

“पुलिस जांच अधूरी है, ऐसे में ज़मानत नहीं दी जा सकती।”

ये निर्णय पहाड़ी कोरवा समाज के लिए आशा की एक किरण बना है।
आगे क्या?
“मग्गू सेठ फाइल्स” की ये सिर्फ शुरुआत है।
अगले एपिसोड में पढ़िए:

🔹 “रजिस्ट्री रैकेट: कैसे बनते हैं कागज़, और कौन बनाता है?”
🔹 “भरोसे की कब्र: आदिवासी जमीनों पर कब्ज़े का सिस्टम”
🔹 “खामोश पुलिस, ताक़तवर दलाल: स्थानीय सत्ता का अंधा गठजोड़”
🔹 “कौन पुलिस अधिकारी लूप लाइन में बैठेने के बाद भी सेठ की मदद कर रहा है?’’
🔹 “किस-किस राजनीति पार्टी के नेता द्वारा विनोद की मदद करने कोई कसर नहीं छोड़ी जा रही है?’’


यदि आप भी ‘मग्गू सेठ’ या इस नेटवर्क से पीड़ित हैं — तो अपनी कहानी साझा करें। हम जुबानबंदी तोड़ेंगे।

यह सीरीज अनुसूचित जनजातियों के अधिकार, ज़मीन के हनन और ग्रामीण न्याय व्यवस्था की वास्तविकता को उजागर करने का एक प्रयास जारी रहेगा…

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