शिक्षा या शोषण? प्राइवेट स्कूलों की बढ़ती फीस की मनमानी पर कब लगेगी लगाम?

शिक्षा

संवाददाता पवन बघेल तिल्दा नेवरा

7240840250

शिक्षा या शोषण? प्राइवेट स्कूलों की बढ़ती मनमानी पर कब लगेगी लगाम?

आज के दौर में शिक्षा को मौलिक अधिकार के रूप में देखा जाता है, लेकिन जब बात प्राइवेट स्कूलों की होती है, तो यह अधिकार एक महंगे सौदे में तब्दील हो जाता है। शिक्षा का व्यवसायीकरण इस कदर बढ़ गया है कि अब स्कूल ‘मंदिर’ नहीं, एक ‘मार्केट’ जैसे नजर आने लगे हैं। अभिभावकों की मजबूरी, प्रबंधन की मनमानी और सरकार की खामोशी – ये तीनों मिलकर शिक्षा को आम आदमी की पहुंच से दूर कर रहे हैं।

1. सिर्फ एक दुकान से खरीदारी का दबाव

हर साल नया सत्र शुरू होते ही स्कूल अभिभावकों को निर्देश देते हैं – किताबें और यूनिफॉर्म केवल “निर्धारित दुकान” से ही खरीदी जाएं।

बाज़ार में वही किताबें सस्ती दरों पर मिल जाती हैं, लेकिन स्कूल द्वारा बताए गए विक्रेता से खरीदना अनिवार्य बना दिया जाता है।

कीमतों में न छूट है, न प्रतिस्पर्धा – बस मजबूरी है।

2. इंट्रेंस टेस्ट = कमाई का ज़रिया

प्राइवेट स्कूलों में दाख़िला अब आसान नहीं रहा।

पहले इंट्रेंस टेस्ट होता है, और इसके नाम पर ₹1000 से ₹3000 तक शुल्क वसूला जाता है।

अगर बच्चा पास नहीं हुआ, तो पैसा भी नहीं लौटाया जाता।

न कोई रसीद, न कोई नियम – सब कुछ प्रबंधन की मर्जी से चलता है।

3. मनमानी फीस और छिपे खर्चे

ट्यूशन फीस के अलावा हर महीने कंप्यूटर, स्मार्ट क्लास, एक्टिविटी, स्पोर्ट्स जैसे चार्ज वसूले जाते हैं।

कई बार बच्चों को उन गतिविधियों में भाग लेने का मौका ही नहीं मिलता, फिर भी फीस देनी होती है।

इस पर सालाना चार्ज, डवलपमेंट फीस और पता नहीं क्या-क्या नाम से वसूली जारी रहती है।

4. हर साल फीस में अंधाधुंध बढ़ोतरी

बिना किसी स्पष्ट कारण के हर साल फीस बढ़ा दी जाती है।

मध्यमवर्गीय परिवार के लिए यह बोझ दिन-ब-दिन बढ़ता जा रहा है।

माता-पिता चाहकर भी विरोध नहीं कर पाते क्योंकि उन्हें अपने बच्चों के भविष्य का डर सताता है।

5. सरकार की चुप्पी खतरनाक

शिक्षा अधिकार कानून तो है, लेकिन निजी स्कूलों पर कोई ठोस नियंत्रण नहीं।

न फीस की सीमा तय है, न पारदर्शिता की गारंटी।

शिकायत करने पर भी कोई कार्यवाही नहीं होती – ऐसा लगता है जैसे सब कुछ “मैनेज” हो जाता है।

निष्कर्ष:

शिक्षा आज सबसे बड़ा व्यवसाय बन चुका है – और वह भी बिना किसी रोक-टोक के। सरकार को चाहिए कि वह सख्त कानून बनाए, रेगुलेटरी बॉडीज़ को सक्रिय करे और अभिभावकों को सुरक्षा दे। नहीं तो वह दिन दूर नहीं जब शिक्षा, सिर्फ पैसे वालों की जागीर बनकर रह जाएगी।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *