जातीय विद्वेष का वीडियो वायरल — पत्थलगांव मे सतनामी और आदिवासी समाज के प्रति अपमाजनक टिप्पणी पर आक्रोश, कड़ी कार्यवाही की मांग

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जातीय विद्वेष का वीडियो वायरल — पत्थलगांव में सतनामी और आदिवासी समाज के प्रति अपमानजनक टिप्पणी पर आक्रोश, कड़ी कार्रवाई की मांग

पत्थलगांव (छत्तीसगढ़), 11 अक्टूबर 2025।
सोशल मीडिया पर इन दिनों पत्थलगांव का एक वीडियो तेजी से वायरल हो रहा है, जिसमें पुरानी बस्ती निवासी उमेश तिवारी उर्फ पिटू तिवारी द्वारा सतनामी और आदिवासी समाज के प्रति अपमानजनक और भड़काऊ टिप्पणियाँ की जा रही हैं। वीडियो में आरोपी खुले तौर पर जातिगत भेदभाव करते दिखाई दे रहा है, जिससे क्षेत्र में गहरा रोष फैल गया है।


घटना का विवरण

जानकारी के अनुसार, घटना उस समय की बताई जा रही है जब आरोपी उमेश तिवारी किसी निजी कारण से पत्थलगांव के एक अस्पताल में सुई लगवाने गया था।
वहां उसने एक कर्मचारी से जाति पूछते हुए कहा —

“भीमते हो क्या? सतनामी तो नहीं हो?”

जब कर्मचारी ने इस पर आपत्ति जताई और वीडियो रिकॉर्ड करने लगा, तो आरोपी ने और भी भड़काऊ बातें करते हुए कहा —

“ले न वीडियो बना रहा है, अच्छा से बना।”

इसके बाद उसने सतनामी, आदिवासी और ओबीसी समाज को लेकर आरक्षण से संबंधित विवादित और अपमानजनक टिप्पणियाँ कीं।


समाज में भारी आक्रोश

वीडियो सामने आने के बाद सतनामी, आदिवासी और पिछड़ा वर्ग समाज में भारी नाराजगी है।
सामाजिक प्रतिनिधियों ने कहा कि —

“यह घटना न केवल अपमानजनक है, बल्कि संविधान की उस भावना का अपमान है, जो सभी नागरिकों को समानता का अधिकार देती है।”

समाज के नेताओं का कहना है कि इस तरह की मानसिकता समाज में नफरत फैलाने का काम करती है और सामाजिक सौहार्द को तोड़ती है।


प्रशासन से कड़ी कार्रवाई की मांग

स्थानीय संगठनों और समाज के बुद्धिजीवियों ने जिला प्रशासन से तत्काल कार्रवाई की मांग की है।
उन्होंने कहा कि आरोपी के खिलाफ एससी/एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत मामला दर्ज किया जाए।

कानूनी दृष्टि से:
सार्वजनिक स्थल या सरकारी परिसर में जातिगत टिप्पणी करना एक गंभीर अपराध है।
ऐसे मामलों में सख्त सजा और जमानत न मिलने का प्रावधान है।


मुख्य मांगें

  • आरोपी उमेश तिवारी के खिलाफ तत्काल FIR दर्ज की जाए।
  • ऐसे लोगों पर निगरानी रखी जाए जो सोशल मीडिया के माध्यम से जातीय नफरत फैलाने की कोशिश करते हैं।
  • अस्पताल प्रबंधन से घटना की विस्तृत रिपोर्ट ली जाए।

संपादकीय टिप्पणी

यह घटना समाज के उस हिस्से की मानसिकता को उजागर करती है, जो आज भी जातिगत श्रेष्ठता और भेदभाव की सोच में जकड़ा हुआ है।
जब देश समानता और सामाजिक न्याय की दिशा में आगे बढ़ रहा है, तब ऐसे बयान केवल आपराधिक ही नहीं बल्कि लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों पर भी चोट करते हैं।

प्रशासन को चाहिए कि वह इस मामले में उदाहरण प्रस्तुत करने वाली सख्त कार्रवाई करे — ताकि भविष्य में कोई भी व्यक्ति जातिगत विद्वेष की भाषा बोलने की हिम्मत न करे।


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